रॉ भारत: भारत की खुफिया ताकत का अनकहा इतिहास
रॉ भारत (Research and Analysis Wing) एक ऐसा नाम है जो रहस्य, गोपनीयता और शक्ति का प्रतीक है। 21 सितंबर, 1968 को स्थापित, रॉ भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी है, जो देश को सीमाओं से परे खतरों से बचाती है। यह ब्लॉग रॉ भारत के उद्भव, संचालन, सफलताओं और चुनौतियों की गहराई में जाता है, और बताता है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा में कैसे अहम बन गया। दुश्मन क्षेत्रों में घुसपैठ से लेकर भू-राजनीतिक परिणामों को आकार देने तक, आइए जानते हैं रॉ भारत के बारे में सब कुछ।
रॉ भारत का जन्म: खुफिया विफलताओं का जवाब
रॉ भारत की कहानी इसके पूर्ववर्ती, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की कमियों से शुरू होती है। ब्रिटिश शासन के दौरान, जबलपुर में ठगी और डकैती विभाग से खुफिया प्रयास शुरू हुए, जो सेंट्रल स्पेशल ब्रांच (CSB) और बाद में सेंट्रल क्राइम इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट (CCID) में विकसित हुआ। 1906 तक इसे IB नाम दिया गया। आजादी के बाद, IB बाहरी खतरों से जूझता रहा, खासकर 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध में जानकारी जुटाने में नाकाम रहा। इन असफलताओं ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक विशेष बाहरी खुफिया एजेंसी—रॉ भारत—बनाने के लिए प्रेरित किया।
1968 में, आर.एन. काव के नेतृत्व में, रॉ भारत की शुरुआत 20 मिलियन डॉलर के बजट और दक्षिण दिल्ली (आज लोधी रोड) में एक कार्यालय के साथ हुई। IB जहां देश के अंदर केंद्रित था, वहीं रॉ भारत को विदेशी खुफिया जानकारी जुटाने का काम सौंपा गया, जो सीधे पीएम को रिपोर्ट करता था। यह भारत की सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था।
रॉ भारत कैसे काम करता है: गोपनीयता और सटीकता
रॉ भारत की सबसे बड़ी खासियत इसकी गोपनीयता है। एजेंटों के नाम कभी दर्ज नहीं होते—न नेमप्लेट, न कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड। वरिष्ठ अधिकारी “सचिव” और कनिष्ठ “अवर सचिव” कहलाते हैं। भर्ती सख्त है—उम्मीदवारों को यह घोषित करना होता है कि उनका या उनके परिवार का आरएसएस या कम्युनिस्ट जैसे समूहों से कोई संबंध नहीं है। यह नियम तब भी नहीं बदला जब आरएसएस से जुड़े नेता जैसे अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. आडवाणी सत्ता में आए।
रॉ भारत के ऑपरेशन साहसिक और सटीक होते हैं। उदाहरण के लिए, “कश्मीर बेदी” नामक एजेंट को 1969 में पाकिस्तान में भेजा गया। इस्लामी परंपराओं में प्रशिक्षित और पंजाबी-उर्दू में निपुण, उसने नई पहचान के साथ सीमा पार की और रेडियो सिग्नल व सुरक्षित लाइनों से महत्वपूर्ण जानकारी भेजी। पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों की तस्वीरें लेने से लेकर अमेरिकी हथियार आपूर्ति को उजागर करने तक, रॉ भारत के एजेंटों ने बिना श्रेय लिए अपनी जान जोखिम में डाली।
रॉ भारत की प्रमुख सफलताएं
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- 1971 का विमान अपहरण और हवाई क्षेत्र प्रतिबंध
रॉ भारत ने 1971 में एक विमान अपहरण की योजना को अपने पक्ष में मोड़ा। एजेंट हाशिम कुरैशी को डबल एजेंट बनाकर, रॉ ने भारतीय विमान को लाहौर उतारा, जिससे पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध लगा। इससे भारत को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में रणनीतिक बढ़त मिली।
- 1971 का विमान अपहरण और हवाई क्षेत्र प्रतिबंध
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- 1984 का सियाचिन ऑपरेशन
लंदन में रॉ भारत के एजेंटों ने खुलासा किया कि पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर के लिए थर्मल कपड़े और उपकरण मंगवाए थे। रॉ ने डिलीवरी में देरी करवाई, और 13 अप्रैल, 1984 को भारतीय सेना ने सियाचिन पर कब्जा कर लिया—एक मास्टरस्ट्रोक जिसे ऑपरेशन मेघदूत कहा गया।
- 1984 का सियाचिन ऑपरेशन
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- पाकिस्तान की परमाणु योजना का पर्दाफाश
रॉ भारत ने खान रिसर्च लैबोरेटरी में वैज्ञानिकों के बालों से न्यूट्रिनो विकिरण का पता लगाया, जिससे पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण की पुष्टि हुई। हालांकि, राजनीतिक बाधाओं ने इसे रोकने से रोका, लेकिन इसने कार्यक्रम में देरी की।
- पाकिस्तान की परमाणु योजना का पर्दाफाश
रॉ भारत की चुनौतियां: राजनीतिक हस्तक्षेप और विफलताएं
रॉ भारत को कई बार राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा। 1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि इंदिरा गांधी ने चुनावों में रॉ का दुरुपयोग किया, जिसके बाद आपातकाल लागू हुआ। विपक्ष ने इसे “लोकतंत्र की हत्या” करार दिया। मोरारजी देसाई के शासन में रॉ की शक्ति कम की गई, और आर.एन. काव को जल्दी रिटायरमेंट लेना पड़ा।
1999 के कारगिल युद्ध में भी रॉ भारत की नाकामी सामने आई। 50,000 जूतों के ऑर्डर और पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद, समन्वय की कमी से भारत को नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) बनाई गई ताकि ऐसी गलतियां दोबारा न हों।
रॉ भारत का विकास और महत्व
1980 में इंदिरा गांधी के दोबारा पीएम बनने के बाद रॉ भारत को फिर से मजबूत किया गया। बजट बढ़ा, नई तकनीकें आईं, और आर.एन. काव को सुरक्षा सलाहकार बनाया गया। आज, रॉ भारत NSC के तहत काम करता है, जिसमें रणनीतिक नीति समूह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड, और संयुक्त खुफिया समिति शामिल हैं। यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि खुफिया जानकारी सही समय पर सही जगह पहुंचे।
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